एकात्ममानववाद, के प्रणेता, पंडितदीनदयाल,उपाध्याय, की जयंती पर जिला, स्तरीय ,संगोष्ठी, का आयोजन, आगर मालवा, 26 सितम्बर
मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर गांधी उपवन आगर में संगोष्ठी आयोजित की गई जिसमें के मुख्य अतिथि व वक्ता *श्री दिलीप जी सकलेचा
ने पं.दीनदयाल उपाध्याय के जीवन दर्शन को बताते हुए कहा कि सुविधाओं में पलकर कोई भी सफलता पा सकता है, पर अभावों के बीच रहकर शिखरों को छूना बहुत कठिन है। 25 सितम्बर,1916 को जन्मे पं दीनदयाल उपाध्याय ऐसी ही विभूति थे।
पं दीनदयाल जी के पिता श्री भगवती प्रसाद ग्राम नगला चन्द्रभान, जिला मथुरा, उत्तर प्रदेश के निवासी थे। तीन वर्ष की अवस्था में ही उनके पिताजी का तथा आठ वर्ष की अवस्था में माताजी का देहान्त हो गया। अतः दीनदयाल का पालन उनके मामा ने किया। ये सदा प्रथम श्रेणी में ही उत्तीर्ण होते थे।
1939 में उन्होंने सनातन धर्म कालेज,कानपुर से प्रथम श्रेणी में बी.ए.पास किया। यहीं उनका सम्पर्क संघ के उत्तर प्रदेश के प्रचारक श्री भाऊराव देवरस से हुआ। इसके बाद वे संघ की ओर खिंचते चले गये। एम.ए.करने के लिए वे आगरा आये; पर घरेलू परिस्थितियों के कारण एम.ए. पूरा नहीं कर पाये। प्रयाग से इन्होंने एल.टी की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। संघ के तृतीय वर्ष की बौद्धिक परीक्षा में उन्हें पूरे देश में प्रथम स्थान मिला था।
अपनी मामी के आग्रह पर उन्होंने प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दी। उसमें भी वे प्रथम रहे; पर तब तक वे नौकरी और गृहस्थी के बन्धन से मुक्त रहकर संघ को सर्वस्व समर्पण करने का मन बना चुके थे। 1942 से उनका प्रचारक जीवन गोला गोकर्णनाथ (लखीमपुर, उ.प्र.) से प्रारम्भ हुआ। 1947 में वे उत्तर प्रदेश के सहप्रान्त प्रचारक बनाये गय ।
1953 के कश्मीर सत्याग्रह में डा. मुखर्जी की रहस्यपूर्ण परिस्थितियों में मृत्यु के बाद जनसंघ की पूरी जिम्मेदारी दीनदयाल जी पर आ गयी। वे एक कुशल संगठक,वक्ता, लेखक, पत्रकार और चिन्तक भी थे। लखनऊ में राष्ट्रधर्म प्रकाशन की स्थापना उन्होंने ही की थी। एकात्म मानववाद के नाम से उन्होंने नया आर्थिक एवं सामाजिक चिन्तन दिया, जो साम्यवाद और पूँजीवाद की विसंगतियों से ऊपर उठकर देश को सही दिशा दिखाने में सक्षम है।
उनके नेतृत्व में जनसंघ नित नये क्षेत्रों में पैर जमाने लगा। 1967 में कालीकट अधिवेशन में वे सर्वसम्मति से अध्यक्ष बनायेे गये। चारों ओर जनसंघ और दीनदयाल जी के नाम की धूम मच गयी। यह देखकर विरोधियों के दिल फटने लगे। 11 फरवरी, 1968 को वे लखनऊ से पटना जा रहे थे। रास्ते में किसी ने उनकी हत्या कर मुगलसराय रेलवे स्टेशन पर लाश नीचे फेंक दी। इस प्रकार अत्यन्त रहस्यपूर्ण परिस्थिति में एक मनीषी का निधन हो गया। हम सबको उनके पद चिन्हों पर चलकर राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाना है ।
संगोष्ठी में श्री संतोष गोयल, श्री अजय जैन, पूर्व श्री प्रेम नारायण यादव, जन अभियान परिषद के जिला समन्वयक श्री प्रेमसिंह चौहान श्री नारायणसिंह बगाना ने भी अपने विचार रखे । संगोष्ठी का संचालन श्री सतनारायण सोनी सूसनेर विकास खण्ड समन्वयक ने किया व आभार मदनलाल मालवीय बडौद विकास खण्ड समन्वयक ने व्यक्त किया । इस अवसर पर प्रस्फुटन नवांकुर सीएमसीएलडीपी छात्र मेंटर्स व सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित थे ।